
फूल है ये..... रास्ता तनहाइयों का , अनगिनत कठिनाइयों का , कंटको के बीच से , पैगाम तू मत भूल ,है ये ।
गुरुवार, 1 अगस्त 2024

रविवार, 21 जुलाई 2024
मंगलवार, 26 दिसंबर 2023
मुक्तेश्वर यात्रा 2023
आज 13 अप्रैल 2023 को मुक्तेश्वर के गोस्टॉपस हॉस्टल के कमरे में बैठ कर बाहर खिड़की से निहारते हुए मै यह लेख लिख रहा हूँ | काफी दिनों से जिस शांति की तलाश में था वह यहाँ मुक्तेश्वर में आकर पूरी हुई | वैसे तो यात्राएँ अब कमोवेश अपने जीवन का हिस्सा बन गयी हैं किन्तु इस यात्रा में मेरा उद्द्येश्य अपनी भागदौड़ की यात्राओं को किनारे कर प्रकृति की नीरवता के मध्य अपने आप से संवाद करना था जो कि इस जगह सुकून से मै कर सकता हूँ |
खिड़की से बाहर दूर तक फैली हरी भरी घाटी की सुंदरता व खूबसूरत पहाड़ी घर मन को एक अलग सुकून प्रदान कर रहें हैं ,सब कुछ स्थिर सा महसूस हो रहा है, यहाँ गति केवल हवा के झोंकों से हिलते पेड़ों की दिखाई पड़ रही है तो वहीँ आवाज केवल कुछेक चिड़ियों एवं पेड़ों की सरसराहट की सुनाई दे रही है |
गो स्टॉप्स हॉस्टल की खिड़की से
मुक्तेश्वर में 2315 मीटर ऊंचाई पर स्थित भगवान शिव के मंदिर की बड़ी मान्यता है ,इस मंदिर के पास खड़े होकर यहाँ की शांति को महसूस करना तथा दूर तलक फैली घाटी की खूबसूरती को निहारते रहना या फिर कहीं एक कोने में बैठकर ध्यान लगाना अपने आप में अद्भुद है ,जहाँ से जाने का मन ही नहीं करता है | मंदिर के बगल से ही घने जंगलों से होकर एक रास्ता कुछेक विचित्र चट्टानी संरचना वाली जगह पर ले जाता है इसे चौली की जाली के नाम से जाना जाता है इस जगह से कुमाऊँ पहाड़ी के साथ हिमालय पर्वत की चोटियों के दर्शन होते हैं ,बहुत सारी साहसिक गतिविधियां जैसे रॉक क्लाइम्बिंग ,ज़िप लाइन इत्यादि भी यहाँ की जाती है |
मुक्तेश्वर महादेव मंदिर के पास से दृश्य
चौली की जाली
इन महीनों में पहाड़ों पर खिलने वाले खूबसूरत बुरांस (रोडोडेंड्रोन ) के फूलों का रस भी यहाँ मंदिर व चौली की जौली के आस पास खूब बिकता है ,मैंने भी इसके स्वाद का अनुभव लिया फिर पहाड़ी राजमा ,भट की दाल व पहाड़ी रायते के साथ चावल को दोपहर के भोजन में आनंद उठाया और वापस अपने हॉस्टल में आ गया ,अब लगभग 2 बज चुके थे ,कमरे की बालकनी से फैले सुन्दर पहाड़ियों ,घाटियों व बागानों पर पड़ती सूर्य की सुनहली किरणें अद्भुद व मनोरम दृश्य उत्पन्न कर रही थी | बस फिर क्या ,आराम करने का ख्याल छोड़कर यह वृत्तांत लिखने बैठ गया हूँ |
तीन बजे के आस पास का समय दिन का सबसे गर्म समय होता है किन्तु इस समय यहाँ पर चलती ठंडी हवाओं से मैंने अपने गर्म कपड़े भी निकाल लिए | पाँच बजे के आस पास चाय पीकर हॉस्टल से बाहर आकर आस पास घूमने तथा किसी सुन्दर पहाड़ी सूर्यास्त पॉइंट ढूंढने निकल गया | ऊपर सड़क के पार जाकर एक पतली सड़क एक गांव की तरफ जाती थी जिस पर थोड़ा आगे जाकर एक ऐसा पॉइंट मिला जहाँ से खूबसूरत पहाड़ी सूर्यास्त का आनंद लिया जा सकता था यहाँ पर मौजूद एक दो किशोरों से बात करते हुए यहाँ कुछ समय व्यतीत किया | चूँकि सूर्यास्त में अभी समय था तो मुख्य सड़क पर वापस आकर ऐसे ही कुछ देर इवनिंग वाक पर जाकर वापस आने का निश्चय किया और लगभग 2 किलोमीटर चलकर यहाँ के सड़क किनारे के मकानों होटलों एवं रेस्टारेंट इत्यादि के साथ इस जगह के पर्यटन व्यवसायिकता एवं संभावनाओं पर भी विचार करता रहा |
इसके बाद दूसरी सुबह 5 बजे से उठकर अपनी बालकनी में बैठकर सुबह की पहली किरण का इंतजार करने लगा और एक खूबसूरत सुबह के साथ ही मुक्तेश्वर से अपनी बैग पैक कर लगभग सात बजे के आस पास अपनी कार से एक लॉन्ग ड्राइव पर पुनः घर की ओर निकल पड़ा |
सूर्योदय मुक्तेश्वर 14 अप्रैल 2023
सोमवार, 10 अक्टूबर 2022
रास्ता अपना हो.............
रास्ता अपना हो सफर अपना हो
हर मंजिल के राही का बस यही सपना हो |
गहरी खाइयाँ हो या हो दुर्गम पहाड़ ,
सपाट मैदान हो या विस्तीर्ण पठार ,
सश्य श्यामल सघन वन हो या मरुभूमि थार ,
चलते ही जाना तुम दूरी चाहे जितना हो |
रास्ता अपना .... ........
अपनी जीवन गाड़ी के मालिक स्वयं आप हो ,
किसी को भी चाहे जितना संताप हो ,
रह अडिग बढ़ाते रहना अपने पदचाप को ,
हर तरफ आपके पदचिन्हों की छाप हो ,
मंजिलों की मरीचिका से आगे यदि मुसाफिर बनना हो ,
रास्ता अपना हो..........
जागेश्वर उत्तरखंड में
शुक्रवार, 16 सितंबर 2022
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| कैमूर पहाड़ियों की शुरुआत रीवा |
ओ देख खोल दृग यह प्रपात
य पतन दृष्टि का शुभ हास।
कवि जड़ वर्षा तक सिखलायेगा,
युग को चेतन का रम्य हम्सस।
बुधवार, 5 अप्रैल 2017
" इंसान अगले एक हज़ार साल तक ज़िंदा नहीं रह पायेगा "
रविवार, 21 अप्रैल 2013
ये सफर चलता .........
- सच्चिदानन्द तिवारी
सोमवार, 31 दिसंबर 2012
नववर्ष आगमन मंगलमय हो .........
रविवार, 23 दिसंबर 2012
आखिर कब बदलेगा तंत्र ....
आज दिल्ली की सड़कों पर एक बार फिर सरकार पर प्रदर्शनकारियों का गुस्सा फूट पड़ा ।हजारों लोगों के समूह ने जनपथ ,राष्ट्रपतिभवन ,मंत्रियों तथा सोनिया गाँधी के आवास का घेराव किया ,और दोषियों को सख्त से सख्त सजा देने तथा भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के सन्दर्भ में सरकार से जवाब माँगा ।हमारे एक मंत्री का जवाब भी आ गया कि भावनाओं में बहकर तंत्र नहीं चलता ,यह एक प्रक्रिया के तहत चलता है ।बेशक मंत्री जी का यह कहना बिलकुल सही है कि दोषियों को सजा हमारे सांविधिनिक व्यवस्था के अन्तर्गत ,न्यायालयों द्वारा प्रदान की जाएगी ,परन्तु जिस तंत्र की दुहाई हमारे मंत्री जी दे रहें है ,क्यों उस में इसी तरह से हजारों बलात्कार के मामले लंबित पड़े है ?और क्यों आधे से अधिक मामलों में दोषी बिना सजा पाए छूट जाते हैं ?बलात्कार की यह कोई नई घटना नहीं है ,आये दिन हमारे समाज में ऐसी वहशियाना घटनायें घटती रहती है ।तब इनको क्यों नहीं ये महसूस हुआ कि हमें तन्त्र में सुधार करने की जरुरत है ? यदि पहले से ही हमारी व्यवस्था चुस्त-दुरुस्त होती और इस प्रकार के घृणित कृत्यों के प्रत्येक दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा दी गयी होती तो क्या आज इंसानियत को शर्मसार करने वाली तथा हैवानियत की सीमा लांघती ऐसी ऐसी घटनाएँ हमारे समाज में घटित होती ?लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं ,किन्तु आज जनता इन जनप्रतिनिधियों का प्रतिनिधित्व करती नजर आती है ।किसी भी कानून की मांग तथा कार्यवाही को लेकर सत्ता के मद में चूर हमारे राजनेताओं को के कानों में तब तक जूं नहीं रेंगती ,जब तक इन्हें अपने कुर्सी के खतरे की घंटी नहीं सुनाई देती है ।आखिर क्यों हमने इन्हें अपना प्रतिनिधि बनाकर भेजा है ?केवल इसी लिए कि ये अपने दस जनपथ और बीस जनपथ स्थित राजमहल में सोते रहें और बाहर जनता अपने न्याय ,सुरक्षा तथा अधिकारों के लिए चिल्लाती रहे ।नहीं साहब !ये भीड़ आज ये चीख-चीख कर कह रही है कि बस बहुत हो चुका ,आज चाहे हम हों या हमारे शासन तंत्र के नुमाइन्दे हों अथवा वीभत्स मानसिकता लेकर हमारे समाज में ही पले-बढ़े ऐसे कृत्यों को अंजाम देने वाले आसामाजिक तत्व , सभी को बदलना होगा ।इनमे से जो भी स्वेच्छा से इस बदलाव को नहीं अपना सकता तो उसे मजबूर करना हम सभी की तथा इस समाज की जिम्मेदारी होगी ,फिर भी ना बदलने पर पर इस सामाजिक दायरे से उसके निष्कासन की जिम्मेदारी भी हमारी ही होगी ।मशहूर कवि दुष्यंत कुमार की ये लाइनें आज सटीक ही बैठती है ----
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012
गजल
शबा चलती थी ,पंखुड़िया लरजती ,तेरे जुल्फों की ,
निखरती है कभी इक अक्स ,दिल के कोरे कागज पर ,
रविवार, 16 दिसंबर 2012
फूल है ये
कुछ तुड़े से ,कुछ मुड़े से ,
और कुछ,
तनकर खड़े से
क्यारियों के ,
फूल है ये ।
हो कहानी,
प्रेम की ,
या मगजमारी ,
क्षेम की ,
हर जगह ,
उल्लास की ,
उठती हुई सी ,
धूल है ये ।
समिति हो ,
संवेदना की ,
इष्ट के ,
आराधना की ,
आर्त के ,
मुश्किल क्षणों में
नित्य चुभते ,
शूल है ये ।
राजपथ
या राजघाट ,
या कभी
शमशान घाट ,
हर नगर ,
हर ग्राम-घर के ,
सुख-दुखों का ,
मूल है ये ।
रास्ता
तनहाइयों का ,
अनगिनत
कठिनाइयों का ,
कंटको के
बीच से ,
पैगाम तू मत भूल ,है ये ।
क्या चमेली ,
रातरानी ,
बेला-चंपा ,
की कहानी ,
हर तरह
हर रंग के इन ,
साथियों का,
मेल है ये ।
मस्त मधु हैं ,
मस्त कलियाँ ,
तन से चिपकी ,
हैं तितलियाँ ,
गूंजते ,
अपनी धुनों में ,
भ्रमर का ,
संगीत हैं ये ।
पददलित
करता है मानव ,
नित्य लाखों को
यहाँ पर ,
पर कभी ,
उफ़ तक न करते ,
क्या करोगे ,
फूल है ये ।
फिर मचलते ,
खिलखिलाते ,
जीव औ जड़ ,
को सिखाते ,
जिन्दगी के
इस सफ़र में ,
क्षण यहाँ ,
अनमोल हैं ये ।
- सच्चिदानन्द तिवारी
-
सोमवार, 10 दिसंबर 2012
ये रात
गुरुवार, 6 दिसंबर 2012
जन से खिसकता तंत्र .....
कहा जाता है की अब तक ज्ञात सभी तंत्रों में जनतंत्र अथवा लोकतंत्र ही एक ऐसी शाशन-पद्धति है ,जिसमें लिए गए निर्णय वास्तविक रूप से रूप से जनता की अभिव्यक्ति तथा जनभावनाओं का प्रतिनिधित्व करते है ।प्रत्यक्षतः जब इस काम को करने में जनता असमर्थ होती है ,तब जनप्रतिनिधियों के माध्यम से वह अपने विचारों व भावनाओं के अभिव्यक्ति की उम्मीद करती है ।जनप्रतिनिधियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे जनता के हितों तथा उनके सर्वांगीण उत्थान के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्णय लेंगे ।किन्तु आज क्या हो रहा है ?जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि जो प्रत्येक सर्वेजनिक मंच पर जनहित की बात करते नहीं अघाते है ,संसद में मतदान के वक्त अपना मत क्यों नहीं व्यक्त कर पातें हैं ?वास्तव में हमारी आज की जनतांत्रिक पार्टियों का जनता से कोई सरोकार रह ही नहीं गया है ।आज इनको इसकी परवाह नहीं है कि एफडीआई से देश के लोगों का भला होगा या नुकसान ।इनको परवाह बस इस बात की है की किसी न किसी प्रकार जोड़-तोड़ करके इनकी राजनीतिक दुकान चलती रहे ।अपना उल्लू सीधा करने के इस प्रयास में आज की ये राजनीतिक पार्टियाँ बाहर से कुछ और तथा अन्दर से कुछ और का दुहरा मानदण्ड अपना रही हैं ।इनका अपना खुद का कोई एजेंडा ही नहीं रह गया है ,एन मौके पर अपना राजनीतिक हित साधने वाली ये पार्टियाँ अपना एजेंडा बदलती रहती हैं ।ऐसा कैसे संभव है कि एक प्रमुख राजनीतिक दल के मुखिया ,जो एफडीआई के खिलाफ राष्ट्रव्यापी बन्द में शामिल हो ,वह संसद में मतदान के अवसर पर इस मसले पर अपने सदस्यों के साथ मतदान किये बगैर चला जाये ।इसी प्रकार अन्य दलों जैसे बसपा ,द्रमुक आदि के रवैये में भी बिरोधाभास दिखाई देता है ।बसपा की मुखिया सुश्री मायावती जी का कहना है कि प्रोन्नति में आरक्षण के बदले में हम एफडीआई के मुद्दे पर सरकार का साथ देंगे ,अन्यथा हम एफडीआई का विरोध करते है ।अब इनको अपने ज्ञानी मष्तिष्क से यह जवाब भी देना चाहिए कि निर्णयों के अदला-बदली के इस खेल में कैसे उन्होंने एक मुद्दे से जुड़े लाभ की तुलना पूरी तरह से भिन्न एक दूसरे मुद्दे से की ?मायावती जी का यह कहना की 'हमें यह भी देखना है हम सांप्रदायिक ताकतों के साथ न खड़े हो ' किसी के गले नहीं उतरने वाला तर्क है ।सभी जानते है कि इन्ही ने कई बार भाजपा की नीतियों का समर्थन किया है और गठबंधन सरकार तक बना चुकी है ।मायावती जी का यह बयान केवल राजनीतिक अवसरवादिता का एक वृकित रूप दर्शाता है ।जिस मुद्दे पर सदन से बाहर तथा सदन से अन्दर चर्चा तक बहुमत इसका विरोध कर रहा हो ,सदन के मतदान में उसका पारित हो जाना इन राजनीतिक दलों की कथनी व करनी में फर्क दिखलाता है ।आज जब हमारी जनतांत्रिक पार्टियों तथा जनता द्वारा चुने गए राजनेताओं का व्यवहार इस तरह का होगा तो जनता में कैसा सन्देश जायेगा ?बात-बात पर संसद की सर्वोच्चता की दुहाई देने वाले हमारे माननीय राजनेताओं को यह समझना पड़ेगा कि हमारे संसद की सर्वोच्चता इसके सदस्यों द्वारा सदाचरण तथा जनता के प्रति जवाबदेही से ही निर्धारित होती है ।यदि ऐसा नहीं हो रहा हो तो जनतंत्र क्या किसी भी तंत्र से जनता का मोहभंग वाजिब ही है ।
मेरी ग़ज़ल
निगाहों में समाया था, कभी ये ख्वाब मेरे भी ,
रौशन इस फिजाँ में कोई ,अपना आशियाँ होगा ।
चमकती रेत ,सूरज की तपिश है ,सारे आलम में ,
खुदा जाने यहाँ दरिया में अब ,पानी कहाँ होगा ।
नहीं होंगी दरकती डोरियाँ ,रिश्तों की आपस में ,
बहेगा खून ना सरहद पे ,राह-ए-राजदां होगा ।
रहेंगीं साथ साहिल पर ,हजारों रंग की हस्ती ,
न हो आमद बलाओं की ,समंदर शांत सा होगा ।
न हो संगीन के साये ,कभी मज़हब की राहों में ,
जमीन-ए-हिन्द का रौशन सितारा यार तब होगा ।
निगाहों में समाया था, कभी ये ख्वाब मेरे भी ,
रौशन इस फिजाँ में कोई ,अपना आशियाँ होगा ।।
बुधवार, 5 दिसंबर 2012
अभिलाषा
ये कागजी दुनिया
जन्म लेते ही, हमारा कागजीकरण कर दिया गया |
बाद में पता चला,
ये कागज दूसरे कागजो को पाने के लिए है |
इसलिए कि कभी तो बेहतर जीवन मिलेगा,
फिर बताया गया कि बेहतर जीवन का मतलब का मतलब यही दूसरे कागज है|यही बताया जा रहा है ,
हमारी आने वाली पीढ़ी को ,
यही दूसरा कागज जिसके पास है ,
वही सफल है,
किन्तु एक बेहतर जीवन कि तलाश में आज भी भटक रहा हूँ|||||
मंगलवार, 4 दिसंबर 2012
गीत
खोजता रहता हूँ ,
इक नाम इसी मेलें में ।
था कोई अपना भी ,
दुनिया के इस झमेले में ।
खोजता -------------
जैसे आता है चाँद ,
शाम घिरने पर आँगन में ,
और चला जाता है ,
नित शहर के उजाले में ।
खोजता -----------
जैसे कलियों पर ,
शबनम की चमकती बूंदें ,
खो जाती है कहीं ,
उषा किरण के रेले में ।
खोजता --------------
आ जाओ फिर कभी ,
फुर्सत में ऐ जान-ए-ग़ज़ल ,
रहते है अभी भी हम ,
ढहते इसी वसेरे में ।
खोजता -------------
रविवार, 18 नवंबर 2012
कॉलेज की ऑटोनोमी
शहर की गलियों -कूचों पर ,
छात्रों के मन मष्तिस्क पर ,
आइ-नेक्सट,जागरण ,उजाला और हिन्दुस्तान के पृष्ठों पर ,
कॉलेज की ऑटोनोमी छाई हुई थी ।
हमने भी पूछा यार ये ,ऑटोनोमी कौन सी चिड़िया का नाम है ?
अपने गोरखपुर की आइआइटी में ,उसका भला क्या काम है ??
सब बोले यार अपने इन छोटे-छोटे खयालों से बाहर निकलो ।
गोरखपुर नहीं अब प्रदेश की आइआइटी होगी ये ,
समय के साथ अपने आप को बदलो ।।
हर बार की तरह ही इस बार भी ,
कॉलेज सफाई अभियान चला ।
यूजीसी एआइसीटीइ की टीमें आई ,
कॉलेज को ऑटोनोमी का ईनाम मिला ।
अनुदान मिले ,अधिकार भी मिले ,
हमने भी सोचा यार किस्मत बदल गयी ।
हमारी भी और उन बेचारी मशीनों की भी ,
जो आज संग्राहालयी कलाकृति में तब्दील हो चुकी हैं ।
हर बैच के छात्रों को ,
जिनका दर्शन कराया जाता है ।
'आज ये दस-बीस सालों से बंद पड़ी है ',
यही ज्यादातर बताया जाता है ।
अब तो इन विद्जनों की एड-हाक फैकल्टी से ,
छोटे से काम के लिए
दौड़ाने वाले नाकारा प्रशासन के झोल-झालों से ,
और मेस के गड़बड़घोटालों से ,
हम लोगों को मुक्ति मिली ।
यह सोच कर अत्यधिक ख़ुशी मिली ।
मैंने भी अपने घर बताया ,
पड़ोसियों को भी बताया ।
प्राइवेट कॉलेज के दोस्तों पर अपना रोब चलाया ।
अरे भाई !यही तो मौके होते हैं सबको बताने के ,
हमने भी कुछ साल पहले इक अच्छा काम किया था ।
आइआइटी की तैयारी का ये कॉलेज ईनाम मिला था ।।
हालत बद से बदतर होती गयी ।
हमारे नव परिवर्तन की आस ,
बस आस बनकर रह गयी ।।
सुना है ,
कॉलेज अब विश्वविद्यालय बनने जा रहा है ,
फिर से नई खुशियाँ मनाने के लिए तैयार हो जाओ मेरे दोस्तों ,
हमारे मुख्यमंत्री साहब का एलान आ रहा है ।।
बुधवार, 31 अक्टूबर 2012
तिनका हूँ...
हवावों में उड़ा जाता हूँ ।
खामोश होकर ,
तूफानों से लड़ा जाता हूँ ।
देख मत ,
ये रौद्र रूप हवावों का ,
पीछे जिनके ,
वीरान खड़ा पाता हूँ ।।
शांत रह ,
ये तूफां तो कुछ पल का है ।
छंट जायेगा ,
आसमां में जो धुंधलका है ।
दिया मालिक ने ,
लघुरूप तो क्या हुआ ?
ये इम्तहान ,
तेरी हिम्मत ,आत्मबल का है ।।
रविवार, 28 अक्टूबर 2012
तारें जमीं पर ..
दोस्तों अपने लिए तो सभी करते है ,पर दूसरों के लिए अपना सब कुछ त्याग कर देने वाले ऐसे लोग विरले ही मिलते है ।आज इस समारोह में ,पूरी दुनिया के कोने -कोने से बहुत ऊँचे -ऊँचे पदों पर आसीन माल्वियंस आये हुए है ।निश्चय ही उनकी उपलब्धियां हमारे तथा इस कॉलेज के लिए गौरवपूर्ण है ,पर वास्तविक रोल मॉडल तो रवि सर है ।
मशहूर शायर दुष्यंत कुमार ने कहा है -
आज सड़कों पर लिखें है सैकड़ों नारे न देख ,
घर अँधेरा देख तू आकाश के तारे न देख ।
एक दरिया है यहाँ पर दूर तक फैला हुआ ,
आज अपने बाजुओं को देख पतवारे न देख ।।
रवि सर के बच्चों के द्वारा,प्रसून जोशी के मशहूर गीत "तारें जमीं पर" किये गए प्रदर्शन ने मंत्रमुग्ध कर लिया । इन मासूम तथा भोले बच्चों के चेहरे कितनी मासूमियत से यही तो कह रहे थे कि आप इन्हें सम्हालिये,इनका बचपन तारों की तरह बिखर ना जाये ।खैर इनको तो इनका रहनुमा मिल गया है ,पर इस तरह के कितनों ही बच्चों को हम आज प्रतिदिन अपने जीवन में देखते है ।हमारी मेस में रोटी बाँटने वाला छोटू ,बसअड्डों ,तथा रेलवे स्टेशनों पर भीख मांगते हुए,चाय ,पानी एवं छोटी-छोटी चीजों को बेचते हुए ये नन्हे -मुन्हे बच्चे, जिनका बचपन ही इनसे छीन लिया जाता है और इस का परिणाम ही होता है उनके पूरे जीवन की त्रासदी ।अपने बचपन की इन भयंकर परिस्थियों से ये उबर नहीं पाते और उनमें से ज्यादातर ज्यादातर अपराध ,वेश्यावृत्ति तथा ड्रग माफियाओं के चंगुल में पड़ जाते है और जीवन भर इसमें से निकल नहीं पाते है ।
आज हमारे बदलते भारत की एक तस्वीर यह दिखाती है की हम चाँद पर पहुँच गए ,अंतरिक्ष की सैर कर रहें हैं ।चारों तरफ भारत -निर्माण तथा इंडिया -शाइनिंग के गीत गाये जा रहें हैं ।हम वैश्विक शक्ति बनने की राह पर हैं ।हमारा सकल घरेलू उत्पाद बहुत तेजी से बढ़ा है ।हमारे बैज्ञानिक तथा इंजीनियर पूरी दुनिया का लोहा मनवा रहे हैं ।इसी तस्वीर का एक दूसरा स्याह पहलू भी है जहाँ असीमित भूख व बेरोजगारी दिखती है ।एक तरफ सपनों में चाँद को छूने की तमन्ना रखने वाला बचपन तो दूसरी तरफ सड़कों पर बिखरता तथा गलियों में दम तोड़ता बचपन ।एक तरफ लम्बी -लम्बी कारों में सारी सुख -सुबिधाओं से युक्त बचपन तो दूसरी तरफ इन्ही कारों की शीशों के बाहर अदद एक रुपये की तलाश में घूमता बचपन ।ये तस्वीरें कौन से भारत का आइना दिखा रहीं हैं?बच्चे ही किसी राष्ट्र व समाज का भविष्य होतें हैं ।इस तरह हमारे देश का बचपन जो सड़कों पर , स्टेशनों पर तथा दुकानों एवं घरेलू नौकरों के रूप में बिखर रहा है ,आने वाले कौन से भारत का निर्माण कर रहा है ?ये सवाल आज हमारे ,हमारी सरकार के तथा हर भारतीय के सामने है ।ऐसे समय में जब न सरकार ना प्रशासन और न ही राज्य इन मासूमों की मासूमियत को बचाने का जिम्मा लेना चाहते हैं ,रवि राय जैसे कुछ दीपक आज भी इस इस घने अंधकार से भरे माहौल में टिमटिमा रहें हैं ।दोस्तों !आज हमारे बीच के कितने साथी कल के प्रतिभाशाली पेशेवर बनने जा रहें हैं ।आज हम यदि इन जैसा दिया बनकर ना भी उजाला फैला सकें तो भी हमें ये ख्याल रखना पड़ेगा की इस तरह के जो दिये जल रहें हैं ,उनकी लौ ना बुझने पाए ।

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