गुरुवार, 1 अगस्त 2024

ये समय का प्रवाह ,
और तैरता हुआ मन। 
ये स्वप्न का उछाह ,
और भागते हुए जन।  

ये मखमली सिलवटें ,
और बदलते हुए करवटें। 
ये शीतल बयार में ,
सेहरा सी तपन। 

सब कुछ की चाह ,
या सब जानने की राह। 
इस भागमभाग में,
भूलते स्वमन औ स्वजन। 

ये न जान पाए ,
कौन हैं हम ,क्यों यहाँ पर हैं ?
निकले जानने ये सारा आलम ,
लोग अन्तर्मन। 

समय है ढूंढ़ अपने को ,
समय के साथ चलकरके। 
कि क्षण जो बीत जाता ,
आएगा ना फिर कभी रे मन। 

                                        -सच्चिदानन्दतिवारी