रविवार, 21 जुलाई 2024

चला था कहीं ,
पहुंचा हूँ कहीं | 
मंजिल है कहाँ,
मालूम नहीं।

मोड़ मिले ,
चौराह मिले |  
बस्तियाँ मिली ,
बाजार मिले | 
हम गए जहाँ ,
तुम वहां नहीं || 

नदियाँ पर्वत ,
झरने नाले ,
जल जंगल जीवन ,
खेत मिले | 
मै खाक छानता कहीं और ,
तुम राह नापते और कहीं || 

काली रातें ,
धुंधले से दिन | 
ये चाँद सितारों ,
की टिम टिम | 
पर नवविहान नवसूरज का ,
मिलता कोई संकेत नहीं|| 

ये समय स्वप्न ,
ये चंचल मन | 
इक पल में यहाँ ,
फिर पल में गमन | 
ये गया जहाँ ,पीछे जन मन ,
भागता हुआ पहुंचा है वहीं ||
                                                                     -सच्चिदानन्द तिवारी