चला था कहीं ,
पहुंचा हूँ कहीं |
मंजिल है कहाँ,
मालूम नहीं।
मोड़ मिले ,
चौराह मिले |
बस्तियाँ मिली ,
बाजार मिले |
हम गए जहाँ ,
तुम वहां नहीं ||
नदियाँ पर्वत ,
झरने नाले ,
जल जंगल जीवन ,
खेत मिले |
मै खाक छानता कहीं और ,
तुम राह नापते और कहीं ||
काली रातें ,
धुंधले से दिन |
ये चाँद सितारों ,
की टिम टिम |
पर नवविहान नवसूरज का ,
मिलता कोई संकेत नहीं||
ये समय स्वप्न ,
ये चंचल मन |
इक पल में यहाँ ,
फिर पल में गमन |
ये गया जहाँ ,पीछे जन मन ,
भागता हुआ पहुंचा है वहीं ||
-सच्चिदानन्द तिवारी