और तैरता हुआ मन।
ये स्वप्न का उछाह ,
और भागते हुए जन।
ये मखमली सिलवटें ,
और बदलते हुए करवटें।
ये शीतल बयार में ,
सेहरा सी तपन।
सब कुछ की चाह ,
या सब जानने की राह।
इस भागमभाग में,
भूलते स्वमन औ स्वजन।
ये न जान पाए ,
कौन हैं हम ,क्यों यहाँ पर हैं ?
निकले जानने ये सारा आलम ,
लोग अन्तर्मन।
समय है ढूंढ़ अपने को ,
समय के साथ चलकरके।
कि क्षण जो बीत जाता ,
आएगा ना फिर कभी रे मन।
-सच्चिदानन्दतिवारी
