गुरुवार, 1 अगस्त 2024

ये समय का प्रवाह ,
और तैरता हुआ मन। 
ये स्वप्न का उछाह ,
और भागते हुए जन।  

ये मखमली सिलवटें ,
और बदलते हुए करवटें। 
ये शीतल बयार में ,
सेहरा सी तपन। 

सब कुछ की चाह ,
या सब जानने की राह। 
इस भागमभाग में,
भूलते स्वमन औ स्वजन। 

ये न जान पाए ,
कौन हैं हम ,क्यों यहाँ पर हैं ?
निकले जानने ये सारा आलम ,
लोग अन्तर्मन। 

समय है ढूंढ़ अपने को ,
समय के साथ चलकरके। 
कि क्षण जो बीत जाता ,
आएगा ना फिर कभी रे मन। 

                                        -सच्चिदानन्दतिवारी

रविवार, 21 जुलाई 2024

चला था कहीं ,
पहुंचा हूँ कहीं | 
मंजिल है कहाँ,
मालूम नहीं।

मोड़ मिले ,
चौराह मिले |  
बस्तियाँ मिली ,
बाजार मिले | 
हम गए जहाँ ,
तुम वहां नहीं || 

नदियाँ पर्वत ,
झरने नाले ,
जल जंगल जीवन ,
खेत मिले | 
मै खाक छानता कहीं और ,
तुम राह नापते और कहीं || 

काली रातें ,
धुंधले से दिन | 
ये चाँद सितारों ,
की टिम टिम | 
पर नवविहान नवसूरज का ,
मिलता कोई संकेत नहीं|| 

ये समय स्वप्न ,
ये चंचल मन | 
इक पल में यहाँ ,
फिर पल में गमन | 
ये गया जहाँ ,पीछे जन मन ,
भागता हुआ पहुंचा है वहीं ||
                                                                     -सच्चिदानन्द तिवारी